गठबंधन में नाम का ‘हाथ’, सपा को अपना ही साथ; पढ़ें एटा में कैसा है चुनाव का हाल
प्रयागभारत, एटा: समाजवादी पार्टी आईएनडीआई गठबंधन के तहत एटा लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ रही है। सपा के देवेश शाक्य एटा लोकसभा सीट पर प्रत्याशी हैं। कांग्रेस से सपा का गठबंधन है। इसलिए यहां से कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। यह गठबंधन यहां सिर्फ नाम का है, क्योंकि दशकों से किसी भी चुनाव में कांग्रेस की स्थिति जमानत बचाने लायक नहीं रही। चंद वोटों में उसके प्रत्याशी सिमटते रहे।
सपा में भी चर्चा हो रही है कि आईएनडीआई गठबंधन में कांग्रेस का हाथ तो सिर्फ नाम का है। समाजवादी पार्टी को सिर्फ अपना ही साथ है। कांग्रेस की स्थिति यह है कि उसके जिलाध्यक्ष तक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। कुछ और वरिष्ठ पदाधिकारियों ने पार्टी छोड़ दी। कार्यकर्ता अपने नेतृत्व के प्रति नाराजगी जता रहे हैं। ऐसे में सपा अपने बूते पर ही इस सीट पर चुनाव लड़ रही है। गठबंधन तो सिर्फ नाम का है।
कांग्रेस के इक्का-दुक्का पदाधिकारी कभी-कभी सपा के मंच पर नजर आ जाते हैं। गठबंधन में कांग्रेस ने अपने कई पुराने नेताओं को यहां खो दिया। वैसे भी देखा जाए तो पिछला चुनावी इतिहास गवाह है कि यहां गैर भाजपा गठबंधन की दाल कभी नहीं गली। विपक्षी गठबंधन का चुनाव का हाल बयां करती अनिल गुप्ता की रिपोर्ट…
लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन है। गठबंधन के नाम पर सपा एकला चलो की तर्ज पर चुनाव में चल रही है। कांग्रेस यहां दशकों से बेवजूद है। वैसे भी वर्ष 2014 से उसकी उपस्थिति लोकसभा चुनाव में सीधे तौर पर नहीं है। लोकसभा क्षेत्र में अपने शून्य जनाधार का आंकलन करके वह सीधे चुनाव में उतरने से बचती रही है। 2014 में कांग्रेस ने महानदल के साथ गठबंधन किया था। और 2019 में राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी को अपना समर्थन दे दिया था।
कांग्रेस ने गठबंधन के प्रयोग यहां किए, लेकिन यहां असफल रहे। इस बार वह समाजवादी पार्टी के साथ आ गई। निरंतर तीसरी बार कांग्रेस का प्रत्याशी यहां चुनाव मैदान में नहीं है। दशकों से चाहे विधानसभा का चुनाव हो या फिर लोकसभा का, कांग्रेस करिश्मा नहीं कर पाई। जमानत बचाने के लिए उसके प्रत्याशी तरसते रहे।
समाजवादी पार्टी के नेता भी अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस के साथ आने से कुछ भी भला नहीं होने वाला, जो कुछ भी करना है, अपने दम पर करना है। इसलिए सपा, मुद्दों को दरकिनार कर जातीय समीकरणों पर अधिक जोर दे रही है। पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी कि पीडीए का मुद्दा उछालकर पार्टी ने नई बहस छेड़ दी है।
सपा के इस फार्मूले से अगड़े सोचने को विवश हैं कि चुनावी राजनीति में क्या इस तरह के फार्मूला कारगर हो सकते हैं। पूर्व में समाजवादी पार्टी यहां एमवाई फैक्टर के तहत चुनाव लड़ती रही है। दो बार उसे सफलता भी मिली, लेकिन 2009 और 2014 के बाद यह फैक्टर यहां सपा के लिए कामयाब नहीं रहा।
इस बार परंपरा बदलकर पार्टी यादव मोहजाल से निकलकर बाहर आई और शाक्य प्रत्याशी को उतार दिया। भाजपा भी शाक्यों को लेकर यह साबित कर रही है कि पार्टी में शाक्यों का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। भले ही एटा में शाक्य प्रत्याशी न हो। मगर आशीष शाक्य को वह पार्टी में लेकर आई है। आशीष पहले सपा से टिकट मांग रहे थे। जब नहीं मिला तो उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। इसके अलावा भाजपा सपा के जाल को तोड़ने के लिए शाक्य विरादरी के स्थानीय छत्रपों को अपने पाले में लाने की मुहिम छेड़ दी है।
शाक्यों में मोदी संदेश
भारतीय जनता पार्टी ने एटा लोकसभा सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह को तीसरी बार चुनाव मैदान में उतारा है। उन्हें हैट्रिक बनाने का मौका दिया गया है। शाक्य समीकरणों को लेकर लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा उथल-पुथल है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रिजोर के बूथ नंबर 217 के अध्यक्ष रंजीत शाक्य से पांच मिनट तक संवाद किया था। आयोजकों ने प्रधानमंत्री की बात शाक्य पदाधिकारी से ही कराई। इस संदेश को भाजपा शाक्यों के बीच प्रचारित कर रही है। दूसरी तरफ सपा भी जानती है कि मुकाबला भाजपा के धुरंधर से है, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का प्रभाव उनके गढ़ में किसी से छिपा नहीं है।
1951 के बाद से ही गिरता गया कांग्रेस का ग्राफा
कांग्रेस की स्थिति देखें तो उसे मिलने वाले वोटों का ग्राफ वर्ष 1951 के बाद से हर बार गिरता चला गया। बीच में उतार-चढ़ाव रहा। वर्ष 2009 तक कांग्रेस ने एटा लोकसभा सीट पर 15 प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाया। इनमें से पांच प्रत्याशी ही चुनाव जीत सके। 1980 के बाद कांग्रेस की जमीन यहां पूरी तरह से बंजर हो गई।
कांग्रेस के जीतने वाले प्रत्याशी
– 1951 रोहनलाल चतुर्वेदी
– 1957 रोहनलाल चतुर्वेदी
– 1967 रोहनलाल चतुर्वेदी
– 1971 रोहनलाल चतुर्वेदी
– 1980 मुहम्मद मुशीर खान
कांग्रेस के हारने वाले प्रत्याशी
– 1962 रोहनलाल चतुर्वेदी
– 1977 मुस्तफा रशीद शेरवानी
– 1984 मुहम्मद मुशीर खान
– 1989 सलीम इकबाल शेरवानी
– 1991 कैलाश यादव
– 1996 गिरीशचंद्र मिश्रा
– 1998 कुंवरपाल सिंह
– 1999 राजेंद्र सिंह
– 2004 रविंद्र
– 2009 महादीपक सिंह शाक्य
