Uttara Pradesh

महिलाओं की कितनी बदली जिंदगी, यहां परिवार की किस्मत बदल रहीं ‘घर की लक्ष्मी’

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प्रयागभारत, गोरखपुर: स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त करने वाली रिंकू देवी के परिवार का खर्च जैसे-तैसे चलता था। महराजगंज के सदर तहसील क्षेत्र के जंगल बड़हरा गांव की रहने वाली इस महिला के मन में अपने परिवार की स्थिति सुधारने को कुछ करने की इच्छा थी। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई भारत सरकार की योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से उनकी इच्छा को बल मिला।

उन्होंने प्रेरणा महिला संकुल समिति के नाम से स्वयं सहायता समूह का गठन किया और स्वच्छता किट बनाने का काम शुरू कर दिया। आज 60 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी के साथ रिंकू तो आत्मनिर्भर बन ही चुकी हैं, उनके प्रयास से गांव की दो दर्जन और महिलाएं भी अपने घर की माली हालत सुधार रही हैं।

घर के काम निपटाने के बाद खाली बैठी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए एनआरएलएम की शुरूआत की गई। लगभग हर गांव में स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जाने लगा। हर एक समूह में 10 महिला को जोड़ा गया। घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया गया।

काम शुरू करने के लिए ऋण भी दिया गया। बड़ी संख्या में महिलाओं ने इस योजना का लाभ उठाया और स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने में जुट गईं। गोरखपुर की महिला उद्यमी संगीता पांडेय ने भी स्वयं सहायता समूह का गठन किया है और उसके जरिए 100 से अधिक महिलाओं को जोड़ा है।

घरेलू इस्तेमाल की विभिन्न वस्तुएं बनवाने के साथ वह उनसे पैकेट भी तैयार कराती हैं। संगीता बताती हैं कि इन महिलाओं को घर बैठे हर महीने 10 हजार रुपये तक की आय हो जाती है। इसी तरह टेराकोटा उत्पाद बनाने वाले परिवार से जुड़ी गुलरिहा बाजार की नंदिनी ने भी स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को जोड़ा और अब उन्हें घर पर ही उत्पाद बनाने का काम देती हैं।

समूह के माध्यम से उन्होंने शोरूम खोला है। उनके साथ जुड़ी महिलाएं भी छह से सात हजार रुपये प्रतिमाह आय अर्जित करने लगी हैं। स्वयं सहायता समूह के माध्यम से मधुमक्खी पालन शुरू करने वाली पिपराइच पराइच की प्रेमशीला कहती हैं कि भारती समूह के माध्यम से उन्होंने अपनी दशा तो सुधारी ही, अन्य महिलाओं को भी आय अर्जित करने का जरिया दिया है।

एनआरएलएम के तहत ऐसे गठित होते हैं समूह

महिलाओं को एनआरएलएम के फायदे बताने के लिए अभियान चलाया जाता है। अभियान में उन्हें समूह की प्रक्रिया व इसके लाभ बताए जाते हैं। इसके बाद न्यूनतम 10 महिलाओं को लेकर एक समूह का गठन होता है। समूह का बैंक सखी के माध्यम से बैंक में खाता खोला जाता है। उसके बाद सभी सदस्य महिलाओं का आधार कार्ड एवं अन्य विवरण आनलाइन किया जाता है।

समूह आनलाइन होने के बाद 2500 रुपये आवंटित होते हैं, जिनमें से 1500 रुपये दरी आदि खरीदने को दिए जाते हैं। जिससे उनकी बैठकें हो सकें। एक हजार रुपये की कुछ अन्य सामग्री दी जाती है। इसके बाद समूह को 15 हजार रुपये का रिवाल्विंग फंड दिया जाता है।

इसके जरिए सामान खरीदकर कुछ काम शुरू करना होता है। सक्रिय समूहों को इसके बाद सामुदायिक निवेश निधि (सीआइएफ) के रूप में एक लाख 10 हजार रुपये दिए जाते हैं। इस पर मामूली ब्याज लगता है। समय से जमा कर देने के बाद समूहों को सीसी लिमिट मिलती है।

समूह के जरिए संचालित कर रहीं वाशिंग पाउडर बनाने का कारखाना

बस्ती जिले में कप्तानगंज के फरेंदा सेंगर की प्रतिमा सिंह ने स्वयं सहायता समूह के जरिए गांव में ही वाशिंग पाउडर बनाने का कारखाना शुरू किया है। आठ नवंबर 2023 को शुरू किए गए इस कारखाने में प्रतिदिन ढाई से तीन क्विंटल वाशिंग पाउडर तैयार होता है।

प्रतिमा बताती हैं कि हर महीने वह 20 से 25 क्विंटल पाउडर बेच लेती हैं। समूह की महिलाओं को 60 रुपये प्रति किलो तथा बाहर 65 रुपये प्रति किलो की दर से बिक्री की जाती है। कारखाने में 20 महिलाएं काम करती हैं, उन्हें आठ घंटे के 300 रुपये दिए जाते हैं। हर महीने 25 हजार रुपये तक की आय हो जाती है। प्रतिमा सिंह का जोर उत्पादन और बढ़ाने पर है।

गोरखपुर व बस्ती मंडल की ये महिलाएं भी लिख रहीं सफलता की कहानी

संतकबीर नगर जनपद के हैंसर बाजार ब्लाक के बंतवार गांव की लक्ष्मी देवी ने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से साबुन बनाने का काम शुरू किया है। गरिमा नाम से तैयार साबुन आनलाइन भी बेचा जा रहा है। इसकी आपूर्ति दूसरे शहरों में भी की जाती है।इसी जिले में महिलाएं मशरूम, मोमबत्ती आदि का उत्पादन भी कर रही हैं।

देवरिया के बनकटा क्षेत्र के इंगुरी सराय गांव की रहने वाली सुमन कुशवाहा ने समूह के माध्यम से ऋण लेकर जनरल स्टोर की दुकान खोली है। छह वर्ष हो गए, वह पूरा ऋण चुका चुकी हैं और हर साल लगभग पौने तीन लाख रुपये की आय भी अर्जित कर रही हैं।

तैयार होती हैं घरेलू उपयोग की वस्तुएं, बकरी, मुर्गी का पालन भी करती हैं समूह की महिलाएं

वर्मी कंपोस्ट, पानी, फिनायल, टायलेट क्लिनर, चाय की पत्ती, नमकीन, अचार, मसाला, अगरबत्ती, जूट बैग, जूता-चप्पल, वाशिंग पाउडर, साबुन, झाड़ू, मशरुम, होजरी उत्पाद, गाय-भैंस-बकरी-मुर्गी पालन, मोमबत्ती, मिट्टी का दीया, मिट्टी से निर्मित चाय का प्याला, सजावटी सामान व रेडिमेड कपड़े, खाद्य प्रसंस्करण, सब्जी, टेराकोटा मिट्टी से गहने, केला के रेशा से हैंडीक्राफ्ट, दोना पत्तल आदि।

पुष्टाहार निर्माण का भी स्वयं सहायता समूहों को मिला जिम्मा

स्वयं सहायता समूहों को पुष्टाहार निर्माण का जिम्मा भी मिला है। टेक होम राशन (टीएचआर) प्लांट के जरिए आंगनबाड़ी केंद्रों को पुष्टाहार की आपूर्ति की जा रही है। एक प्लांट से 300 स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा गया है। 20 महिलाएं सक्रिय रूप से यहां काम करती हैं। उन्हें आठ हजार रुपये प्रतिमाह भुगतान किया जाता है।

महिलाओं ने क्‍या कहा

स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद स्थिति में सुधार हुआ है। पहले आर्थिक रूप से परेशानियों का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब स्थिति बदली है। मेरे घर पर ही महिलाओं के साथ मिलकर विभिन्न तरह के बोर्ड का निर्माण किया जाता है। इससे अच्छी आमदनी हो जाती है। सुप्रिया राय, रामनगर, गोरखपुर।

सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चला रही है। महिलाएं थोड़ा जागरूक होकर योजनाओं से जुड़कर कार्य करें तो तरक्की से कोई रोक नहीं सकता है। गांव में रहने वाली कई महिलाएं मेहनत से समाज में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी हैं। निर्मला देवी, पचौरी, गोरखपुर।

आदर्श टेराकोटा समूह का गठन कर अनुसूचित जाति की महिलाओं को टेराकोटा के व्यवसाय से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही हूं। वर्तमान में इस समूह में 30 से अधिक महिलाएं कार्य कर रही हैं। आमदनी होने से उनकी पारिवारिक स्थिति भी सुधरी है। पूनम देवी, एकला नंबर दो, गोरखपुर।

वर्ष 2017 में समूह का गठन किया। अब तक कुल 15 समूह गठित हो चुके हैं। इसमें 244 महिलाएं जुड़ी हैं। इनके द्वारा अचार बनाया जाता है। इसके अलावा महिलाएं लीज पर लेकर खेती भी कराती हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। जीवन स्तर भी बदला है। चंदा देवी, इस्लामपुर, गोरखपुर।

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