Uttarakhand

Uttarakhand में पहली बार बनेगा प्लास्टिक वेस्ट डंपिंग जोन का सैटेलाइट मैप, USAC तैयार करेगा वैज्ञानिक बेस मैप

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Spread the loveप्रयाग भारत, देहरादून : Uttarakhand में बढ़ते प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने के लिए अब वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र यानी USAC राज्यभर में प्लास्टिक वेस्ट डंपिंग जोन की मैपिंग […]

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प्रयाग भारत, देहरादून : Uttarakhand में बढ़ते प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने के लिए अब वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र यानी USAC राज्यभर में प्लास्टिक वेस्ट डंपिंग जोन की मैपिंग करने की तैयारी में है। सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए उन इलाकों को चिन्हित किया जाएगा, जहां प्लास्टिक कचरे का जमाव ज्यादा है।

इस मैपिंग के बाद राज्य में प्लास्टिक कचरे के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान हो सकेगी। साथ ही इन स्थानों पर सफाई, कचरा संग्रहण, परिवहन, उपचार और रिसाइक्लिंग की भविष्य की योजनाओं को वैज्ञानिक आधार मिल सकेगा।

पर्यटन और तीर्थाटन के साथ बढ़ रहा प्लास्टिक का दबाव

उत्तराखंड देश-विदेश में पर्यटन और तीर्थाटन के लिए जाना जाता है। हर साल लाखों पर्यटक और श्रद्धालु राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचते हैं। इसके साथ प्लास्टिक बोतल, पैकेजिंग, खाद्य पदार्थों के रैपर और दूसरे प्लास्टिक उत्पादों का इस्तेमाल भी बढ़ता है। मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहाड़ी इलाकों में कचरे को इकट्ठा कर उसे नीचे लाना और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। यही वजह है कि शहरों के अलावा पर्यटन स्थलों, तीर्थ मार्गों और पहाड़ी क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरा बड़ी चिंता बनता जा रहा है।

एक साल में करीब 45 हजार टन प्लास्टिक कचरा

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में अनुमानित प्लास्टिक कचरा उत्पादन 44,924.71 टन प्रतिवर्ष था। यानी राज्य में औसतन करीब 123 टन प्लास्टिक कचरा हर दिन पैदा होने का अनुमान है।

ये आंकड़े बताते हैं कि प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए केवल सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए कचरे की वास्तविक लोकेशन और उसके दबाव वाले क्षेत्रों की पहचान भी जरूरी है।

जिलों में तैयार किया जा रहा प्लास्टिक वेस्ट का मैप

USAC की ओर से इस दिशा में काम शुरू किया जा चुका है। राज्य के अलग-अलग जिलों में प्लास्टिक आधारित डंपिंग जोन का मैप तैयार किया जा रहा है। मैपिंग पूरी होने के बाद यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि प्लास्टिक कचरे के लिहाज से कौन-कौन से इलाके सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं।

USAC के निदेशक दुर्गेश पंत के मुताबिक, मैपिंग का उद्देश्य राज्य में प्लास्टिक कचरे के संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर भविष्य की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना है।

सिर्फ डंपिंग साइट नहीं, पूरे कचरा प्रबंधन की बनेगी योजना

इस परियोजना का मकसद सिर्फ प्लास्टिक कचरा जमा होने वाली जगहों को चिन्हित करना नहीं है। मैपिंग के जरिए यह भी समझने की कोशिश होगी कि किन इलाकों में प्लास्टिक का दबाव ज्यादा है और किन क्षेत्रों में तत्काल प्रबंधन की जरूरत है।

इसके आधार पर संबंधित विभाग यह तय कर सकेंगे कि कहां नियमित सफाई की जरूरत है, कहां कचरा संग्रहण केंद्र मजबूत किए जाने चाहिए और किन इलाकों में प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट या रिकवरी सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं।

पर्यटन मार्ग और तीर्थ स्थल भी होंगे फोकस में

प्लास्टिक कचरे की समस्या शहरों तक सीमित नहीं है। पर्यटन मार्गों और तीर्थ स्थलों पर बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही के कारण यहां भी कचरे का दबाव बढ़ता है।

पर्यटन विभाग के 2024 के आंकड़ों के अनुसार देहरादून में करीब 64.92 लाख, मसूरी में 21.35 लाख, ऋषिकेश में 9.69 लाख और केदारनाथ में करीब 16.54 लाख पर्यटकों की आवाजाही दर्ज की गई थी।

इतनी बड़ी संख्या में आने वाले लोगों के कारण इन क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे के संग्रहण और निस्तारण की व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी हो जाता है।

हाई हिमालय और बुग्याल तक पहुंच रहा प्लास्टिक

प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या अब ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों और बुग्यालों तक भी पहुंच रही है। वन विभाग के CCF पर्यावरण सुशांत पटनायक के अनुसार पर्यटकों और ट्रेकिंग गतिविधियों के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भी प्लास्टिक की मौजूदगी चिंता का विषय बन रही है।

हाई हिमालय में समस्या इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि यहां से कचरे को वापस नीचे लाना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर पहले से बेहतर प्रबंधन व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है।

प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट को मिलेगी सही लोकेशन

राज्य में पहले से ही प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं मौजूद हैं। स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत ब्लॉक स्तर पर Plastic Waste Management Unit स्थापित करने और गांवों से एकत्र प्लास्टिक को इन केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।

USAC की मैपिंग से यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किस क्षेत्र में ऐसी व्यवस्था की सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे संग्रहण केंद्र, परिवहन व्यवस्था और सफाई अभियानों को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जा सकेगा।

रिसाइक्लिंग नेटवर्क को भी मिलेगी मदद

राज्य में प्लास्टिक कचरे के प्रसंस्करण और रिसाइक्लिंग से जुड़ी इकाइयां भी मौजूद हैं। हरिद्वार और रुड़की समेत विभिन्न क्षेत्रों में प्लास्टिक वेस्ट प्रोसेसिंग से जुड़ी इकाइयां पंजीकृत हैं।

अगर डंपिंग जोन का वैज्ञानिक नक्शा तैयार होता है तो इन क्षेत्रों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे को रिसाइक्लिंग नेटवर्क तक पहुंचाने की योजना भी ज्यादा प्रभावी तरीके से बनाई जा सकती है।

प्लास्टिक मुक्त उत्तराखंड के लिए बनेगा बेस मैप

USAC की इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि प्लास्टिक कचरे की समस्या को पहली बार बड़े स्तर पर जियो-स्पेशियल डेटा से जोड़ा जा सकेगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि राज्य में प्लास्टिक कचरा कहां जमा हो रहा है, कौन से क्षेत्र ज्यादा संवेदनशील हैं और किन जगहों पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।

उत्तराखंड में सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध पहले से लागू है। अब सैटेलाइट आधारित मैपिंग के जरिए मौजूदा व्यवस्थाओं को वैज्ञानिक लोकेशन और डेटा का आधार मिल सकता है।

सफाई अभियान से आगे बढ़ेगा प्लास्टिक प्रबंधन

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में प्लास्टिक समस्या का समाधान सिर्फ प्रतिबंध या सफाई अभियान से संभव नहीं है। इसके लिए कचरे की लोकेशन, संग्रहण, परिवहन, रिसाइक्लिंग और अंतिम निस्तारण को एक साथ जोड़कर काम करना होगा।

USAC की प्रस्तावित सैटेलाइट मैपिंग इसी दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है। अगर तैयार मैप के आधार पर योजनाएं लागू होती हैं, तो भविष्य में राज्य में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट ज्यादा व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से किया जा सकेगा।

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