Varanasi : दिवाली पर गुम हो रही बनारस की सदियों पुरानी परंपरा, कंप्यूटर के दौर में 75% तक गिरा लाल कपड़े वाली खाता-बही का कारोबार
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प्रयाग भारत , वाराणसी : दीपावली का त्योहार रोशनी, खुशियों और समृद्धि का प्रतीक है। इस पर्व पर घरों और प्रतिष्ठानों में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के साथ नई शुरुआत की जाती है। भारतीय संस्कृति में दिवाली से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिन्हें पीढ़ियों से निभाया जाता रहा है। इन्हीं में से एक है व्यापारियों की लाल कपड़े वाली पारंपरिक खाता-बही, जिसका कभी हर छोटे-बड़े कारोबार में विशेष महत्व हुआ करता था। हालांकि, बदलते समय और डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने इस पुरानी परंपरा को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया है।
धर्म नगरी काशी यानी वाराणसी में कभी दिवाली से करीब 15 दिन पहले ही खाता-बही की खरीदारी शुरू हो जाती थी। शहर के चौक, ठठेरी बाजार, काशीपुरा और कचौड़ी गली की स्टेशनरी दुकानों पर व्यापारियों की भीड़ उमड़ती थी। कपड़े की दुकानों से लेकर बड़े-बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक हर जगह लाल कपड़े में लिपटी नई खाता-बही की मांग रहती थी। दिवाली के दिन विधि-विधान से इनका पूजन किया जाता था और फिर पूरे साल का व्यापारिक लेखा-जोखा इसी में दर्ज होता था।
लेकिन अब कंप्यूटर, डिजिटल अकाउंटिंग और ऑनलाइन हिसाब-किताब के दौर में यह परंपरा सिमटती जा रही है। कभी खाता-बही की बिक्री से गुलजार रहने वाली वाराणसी की कचौड़ी गली में भी अब ग्राहकों की संख्या काफी कम हो गई है। इस पारंपरिक कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक, खाता-बही का व्यवसाय करीब 75 प्रतिशत तक गिर चुका है।
कभी दिवाली से तीन महीने पहले शुरू हो जाती थी खाता-बही की तैयारी
वाराणसी में कई पीढ़ियों से खाता-बही बनाने और बेचने का कारोबार करने वाले रोहित चोपड़ा बताते हैं कि एक समय था जब इस व्यवसाय की काफी मांग हुआ करती थी। उनके परिवार का इस कारोबार में लंबे समय तक वर्चस्व रहा। दिवाली से करीब तीन महीने पहले ही खाता-बही तैयार करने का काम शुरू कर दिया जाता था। इसके लिए 50 से अधिक मजदूर लगाए जाते थे, इसके बावजूद कई बार मांग पूरी करना मुश्किल हो जाता था।
उन्होंने बताया कि बनारस की साड़ी की दुकानों, कपड़ों के प्रतिष्ठानों और बड़े-बड़े उद्योगों में इन खाता-बही का इस्तेमाल होता था। दिवाली के दिन इनका पूजन मां सरस्वती के स्वरूप के रूप में किया जाता था। खाता-बही के पहले पन्ने पर गणेश-लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं के नाम लिखकर शुभ-लाभ और स्वास्तिक बनाया जाता था। इसके बाद पूरे साल व्यापार का हिसाब-किताब इसी में दर्ज किया जाता था।
रोहित चोपड़ा के मुताबिक, पहले अच्छी खाता-बही की कीमत करीब 500 रुपये तक होती थी, लेकिन अब 50 रुपये में भी ग्राहक इसे खरीदने में रुचि नहीं दिखाते। इसे तैयार करने की प्रक्रिया भी सामान्य रजिस्टर या कॉपी से अलग होती है। इसमें कागज, कपड़े और सिलाई से लेकर लिखावट तक का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
खाता-बही तैयार करने में लगती है मेहनत और समय
पारंपरिक खाता-बही तैयार करना आसान काम नहीं है। इसे बनाने में विशेष कागज, कपड़े और बाइंडिंग का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलग-अलग आकार और उपयोग के हिसाब से कई प्रकार होते हैं। इन्हें तैयार करने में समय के साथ-साथ लागत भी लगती है।
दिवाली पर व्यापारियों की पूजा कराने वाले पंडित राजेंद्र प्रसाद मिश्रा बताते हैं कि खाता-बही केवल व्यापार का हिसाब-किताब रखने वाली किताब नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। आज भले ही अधिकांश व्यापारी कंप्यूटर और डिजिटल माध्यमों से अपना लेखा-जोखा रखते हों, लेकिन पारंपरिक खाता-बही का पूजन आज भी कई परिवारों में किया जाता है।
उन्होंने बताया कि खाता-बही के पहले पन्ने पर विशेष धार्मिक परंपरा का पालन किया जाता है। सबसे ऊपर बड़े अक्षरों में ‘श्री गणेशाय नमः’ लिखा जाता है। इसके बाद ‘श्री गणेश जी सदा सहाय’, ‘श्री लक्ष्मी जी सदा सहाय’, ‘श्री हनुमान जी सदा सहाय’, ‘श्री सरस्वती जी सदा सहाय’ और ‘श्री महाकाली सदा सहाय’ लिखा जाता है।
इसके दोनों तरफ शुभ-लाभ लिखा जाता है। इसके बाद उस वर्ष का शुभ संवत, दिवाली का वार और अंत में ‘इति शुभ’ लिखकर नई खाता-बही की शुरुआत की जाती है। कई व्यापारी इसमें अपने गोत्र, प्रतिष्ठान का नाम और मां लक्ष्मी की कृपा से नया खाता शुरू करने का उल्लेख भी करते हैं।
पांच पीढ़ियों से कपड़े का कारोबार कर रहा केसरी परिवार
वाराणसी में करीब पांच पीढ़ियों से कपड़े का कारोबार कर रहे तरुण केसरी का कहना है कि खाता-बही उनके लिए केवल व्यापारिक हिसाब रखने का साधन नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है। उनका परिवार आज भी अपनी दुकान में पारंपरिक खाता-बही का इस्तेमाल करता है।
तरुण केसरी बताते हैं कि डिजिटल व्यवस्था के अपने फायदे हैं, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता। बिजली न होने पर कंप्यूटर बंद हो सकता है, इंटरनेट की समस्या से ऑनलाइन काम रुक सकता है और सॉफ्टवेयर खराब होने पर डेटा तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत पारंपरिक खाता-बही में हाथ से लिखा गया हिसाब जरूरत पड़ने पर आसानी से देखा जा सकता है।
उन्होंने बताया कि उनकी दुकान में रोजाना का लेखा-जोखा, खर्च, बिक्री और मुनाफे से जुड़ी जानकारी नियमित रूप से दर्ज की जाती है। सप्ताह और महीने के अंत में इसी के आधार पर व्यापार की स्थिति का आकलन किया जाता है।
तरुण केसरी का कहना है कि नई पीढ़ी धीरे-धीरे इस परंपरा से दूर होती जा रही है। ऐसे में इसे बचाकर रखना जरूरी है। उनका मानना है कि कंप्यूटर अपनी जगह उपयोगी है, लेकिन पारंपरिक खाता-बही का अपना अलग महत्व है। इसी वजह से उनका परिवार हर साल दिवाली पर नई खाता-बही लाता है और विधि-विधान से उसका पूजन करता है।
खाता-बही के अलग-अलग प्रकार, हर किताब का था अपना काम
पुराने समय में व्यापारियों के लिए खाता-बही का मतलब केवल एक रजिस्टर नहीं होता था। व्यापार की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग किताबें रखी जाती थीं। हर किताब में लेन-देन की एक विशेष जानकारी दर्ज की जाती थी।
1. उचन्त खाता या उधार खाता: इस बही में ग्राहकों को दिए गए उधार और उनके बकाया भुगतान का पूरा विवरण लिखा जाता था। किस व्यक्ति को कितना माल दिया गया और कितनी रकम बाकी है, इसकी जानकारी इसमें रहती थी।
2. रोजनामचा: यह लंबी और पतली किताब होती थी। इसमें रोजाना होने वाली बिक्री, खर्च और व्यापार से जुड़ी अन्य गतिविधियों का हिसाब दर्ज किया जाता था।
3. जमा नकल बही: इस बही का इस्तेमाल दिनभर में प्राप्त नकदी और खाते में जमा होने वाली रकम का विवरण रखने के लिए किया जाता था।
4. नाम नकल बही: इसमें व्यापार के दौरान किए गए भुगतानों और विभिन्न लोगों को दी गई रकम का लेखा-जोखा दर्ज किया जाता था।
5. खाता-बही: इसमें अलग-अलग लेन-देन, खर्च, भुगतान और व्यापार से संबंधित जानकारियों को व्यवस्थित तरीके से लिखा जाता था। इसकी मदद से व्यापारी अपनी आमदनी, खर्च और मुनाफे का हिसाब लगा पाते थे।
खाता-बही में छिपा है व्यापारियों का विश्वास और आस्था का रिश्ता
पुराने व्यापारिक समाज में खाता-बही को लेकर एक कहावत भी काफी प्रचलित रही है- ‘पहले लिख बाद में दे, अगर चूके तो खाता-बही से देख।’ इस कहावत का अर्थ था कि व्यापार में हर लेन-देन को लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी तरह का भ्रम या विवाद न हो।
खाता-बही में केवल पैसों का हिसाब नहीं रखा जाता था, बल्कि व्यापारियों के आपसी विश्वास और लेन-देन की पारदर्शिता का भी आधार यही किताब होती थी। इसी वजह से दिवाली पर नई खाता-बही खरीदने और उसका पूजन करने की परंपरा को शुभ शुरुआत से जोड़कर देखा जाता था।
डिजिटल दौर में क्यों खत्म हो रहा खाता-बही का कारोबार?
खाता-बही का कारोबार कम होने के पीछे सबसे बड़ी वजह व्यापारिक व्यवस्था में आया बदलाव है। अब ज्यादातर व्यापारी कंप्यूटर, मोबाइल और अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के जरिए अपना हिसाब-किताब रखते हैं। जीएसटी, ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल रिकॉर्ड के बढ़ते इस्तेमाल ने भी पारंपरिक बहीखातों की जरूरत कम कर दी है।
इसके अलावा नई पीढ़ी का पारंपरिक हिंदी लेखन से जुड़ाव भी कम हो रहा है। पहले खाता-बही में शुद्ध हिंदी और पारंपरिक व्यापारिक शब्दों का इस्तेमाल होता था। जैसे- रोकड़, नकद भुगतान, उचन्त, शेष, जमा और कुल आदि। इन शब्दों और लिखने की पद्धति का ज्ञान अब सीमित होता जा रहा है।
ऐसे में वाराणसी की कचौड़ी गली में कभी खूब फलने-फूलने वाला खाता-बही का कारोबार आज अस्तित्व बचाने की चुनौती से जूझ रहा है। हालांकि, कुछ व्यापारी आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। उनके लिए लाल कपड़े वाली खाता-बही सिर्फ पुराने जमाने की किताब नहीं, बल्कि व्यापार, संस्कृति और आस्था से जुड़ी विरासत है।