Uttarakhand

Dehradun Crime: रिटायरमेंट सिटी में बुजुर्गों की सुरक्षा पर सवाल, 453 अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक पुलिस रिकॉर्ड में

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प्रयाग भारत, देहरादून: देहरादून को लंबे समय से रिटायरमेंट सिटी के तौर पर जाना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग नौकरी से रिटायर होने के बाद शांत और सुकून भरी जिंदगी बिताने के लिए देहरादून का रुख करते हैं। खुशनुमा मौसम, शांत माहौल और बेहतर सुविधाओं के कारण बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक यहां अपना आशियाना बनाते हैं। लेकिन अब इसी रिटायरमेंट सिटी में अकेले या बुजुर्ग दंपति के रूप में रह रहे लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

रायपुर के विष्णु लोक कॉलोनी में बुजुर्ग दंपति और उनकी घरेलू सहायिका समेत तीन लोगों की हत्या ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अकेले रहने वाले बुजुर्ग अपनी सुरक्षा के लिए किस पर भरोसा करें। पुलिस की ओर से वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था और सेल होने के बावजूद अगर अपराधी घर में घुसकर बुजुर्गों को निशाना बना रहे हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

तीन हत्याओं ने फिर बढ़ाई बुजुर्गों की सुरक्षा की चिंता

6 अक्टूबर को रायपुर में बुजुर्ग दंपति समेत तीन लोगों की हत्या ने पूरे शहर को झकझोर दिया। पुलिस के मुताबिक, वारदात के आरोपी को कुछ ही घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया। बताया गया कि आरोपी प्लंबर के तौर पर घर में पहुंचा था।

आरोप है कि उसने पहले बुजुर्ग दंपति पर हमला किया। उनकी चीख सुनकर मदद के लिए पहुंची घरेलू सहायिका शीला को भी आरोपी ने नहीं बख्शा। बताया गया कि शीला ने अपने छोटे बच्चों का हवाला देकर जान की भीख मांगी, लेकिन आरोपी ने कथित तौर पर पेचकस से हमला कर उसकी भी हत्या कर दी।

इस घटना ने बुजुर्गों की सुरक्षा से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि घर की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जिन बाहरी लोगों पर बुजुर्ग निर्भर रहते हैं, उनकी पहचान और पृष्ठभूमि की जांच किस स्तर तक होती है।

रिटायरमेंट के बाद सुकून चाहिए था, सुरक्षा बनी चिंता

देहरादून में कई वरिष्ठ नागरिक रिटायरमेंट के बाद अकेले या सिर्फ पति-पत्नी के साथ रहते हैं। कई परिवारों में बच्चे नौकरी और कारोबार के चलते दूसरे शहरों या विदेशों में रहते हैं।

ऐसे में बुजुर्गों को घर की मरम्मत, प्लंबिंग, बिजली, सफाई और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए बाहरी लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही निर्भरता कई बार सुरक्षा का जोखिम भी बढ़ा सकती है।

रायपुर की घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या अकेले रहने वाले बुजुर्गों के घर आने-जाने वाले लोगों की पर्याप्त जांच होती है? क्या पुलिस के पास घरेलू सहायकों और अलग-अलग सर्विस प्रोवाइडरों का अपडेटेड रिकॉर्ड मौजूद है? क्या किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी समय रहते पुलिस तक पहुंचती है?

पुलिस रिकॉर्ड में 453 अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक

पुलिस के मुताबिक, देहरादून जिले में 453 ऐसे वरिष्ठ नागरिक दर्ज हैं, जो अकेले रह रहे हैं। इनमें कई बुजुर्गों के बच्चे दूसरे शहरों या राज्यों में रहते हैं।

ऐसे वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए पुलिस मुख्यालय स्तर पर सीनियर सिटीजन सेल भी मौजूद है। इसी साल एसएसपी की ओर से थाना प्रभारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों से संपर्क करने, उनकी कुशलक्षेम जानने और उन्हें पुलिस एवं कंट्रोल रूम के नंबर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे।

बीट स्तर पर भी बुजुर्गों से नियमित संपर्क की व्यवस्था का प्रावधान है। लेकिन रायपुर की घटना के बाद सवाल यह है कि इन व्यवस्थाओं का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है।

अगर पुलिस के पास अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों का रिकॉर्ड मौजूद है, तो उनकी सुरक्षा से जुड़े इंतजाम कितनी नियमितता से अपडेट किए जा रहे हैं, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।

सिर्फ रजिस्टर में नाम दर्ज करना पर्याप्त नहीं: सूर्यकांत धस्माना

कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बुजुर्गों की सुरक्षा का मतलब केवल थाने के रजिस्टर में उनका नाम, पता और मोबाइल नंबर दर्ज करना नहीं होना चाहिए।

उनके मुताबिक, पुलिस को यह भी पता होना चाहिए कि अकेले रहने वाले बुजुर्गों के घर नियमित रूप से कौन-कौन लोग आते हैं। घरेलू सहायकों की पहचान क्या है और प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन या दूसरे सर्विस प्रोवाइडर कौन हैं, इसकी जानकारी भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा होनी चाहिए।

खासकर उन बुजुर्गों के मामले में यह व्यवस्था और महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनके बच्चे दूसरे शहरों या राज्यों में रहते हैं।

पुलिस और स्थानीय समुदाय के बीच सुरक्षा नेटवर्क की जरूरत

रायपुर की घटना ने देहरादून में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बहस फिर तेज कर दी है। जरूरत ऐसे सुरक्षा नेटवर्क की है, जिसमें पुलिस, स्थानीय समुदाय और वरिष्ठ नागरिकों के बीच लगातार संपर्क बना रहे।

घरेलू सहायकों और सर्विस प्रोवाइडरों का सत्यापन, नियमित पुलिस संपर्क और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तत्काल सूचना जैसे कदम बुजुर्गों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।

रिटायरमेंट के बाद शांत और सुरक्षित जीवन की तलाश में देहरादून आने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सुकून के इस शहर में उनकी सुरक्षा कितनी मजबूत है।