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RBI की नई नीति का फोकस बदला: विदेशी निवेश बढ़ाने और रुपये को स्थिर करने पर जोर

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प्रयाग भारत,भारत: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की हालिया मौद्रिक नीति इस बार पारंपरिक मुद्रास्फीति नियंत्रण के दायरे से आगे बढ़कर विदेशी निवेश को आकर्षित करने और बाहरी आर्थिक दबावों को कम करने पर अधिक केंद्रित दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था में घटते विदेशी पूंजी प्रवाह और रुपये पर बढ़ते दबाव को संतुलित करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है।

नीति के तहत विदेशी संस्थागत निवेश (FII) को प्रोत्साहित करने के लिए कई उपायों की घोषणा की गई है। इनमें दीर्घकालिक पूंजीगत कर और विदहोल्डिंग टैक्स से जुड़ी राहत जैसे कदम शामिल हैं। इसके अलावा बैंकों को तीन से पांच साल की अवधि वाले FCNR(B) डिपॉजिट जुटाने की अनुमति दी गई है, जिसमें हेजिंग लागत का भार केंद्रीय बैंक वहन करेगा।

साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को रियायती फॉरेक्स स्वैप के माध्यम से बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ECB) जुटाने की सुविधा भी दी गई है। इन कदमों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ाकर देश के भुगतान संतुलन (BOP) को मजबूत करना है।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार इन नीतिगत उपायों से वित्त वर्ष 2027 तक 35 से 45 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त पूंजी प्रवाह संभव है, जो बाहरी खाता घाटे को काफी हद तक संतुलित कर सकता है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं और कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं, तो रुपये में स्थिरता आ सकती है और यह डॉलर के मुकाबले एक सीमित दायरे में रह सकता है।

कुल मिलाकर, आरबीआई की यह नीति विदेशी निवेश को बढ़ावा देकर रुपये पर दबाव कम करने और देश की बाहरी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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