Uttarakhand के 26 साल: तीन जिलों में सिमटी 71% अर्थव्यवस्था, पहाड़ी जिले विकास की दौड़ में पीछे
Summary
ख़बर शेयर करें -प्रयाग भारत , देहरादून: उत्तराखंड 9 नवंबर को अपना 26वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। अलग राज्य बनने के पीछे एक बड़ी उम्मीद यह थी कि पर्वतीय क्षेत्रों तक विकास पहुंचेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार […]
More On prayag bharat
- Patanjali योगपीठ में स्वामी रामदेव से मिले हरीश रावत, बंद कमरे में 15 मिनट हुई मुलाकात; सियासी चर्चाएं तेज
- Uttarakhand रोडवेज कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू, 500 से ज्यादा बसों के पहिए थमे; यात्री परेशान
- Urmila Sanawar ने कोर्ट में लगाई जमानत अर्जी, 29 अक्टूबर को होगी सुनवाई; पुलिस से मांगी जांच रिपोर्ट
- Gairsain में विधानसभा सत्र के पहले दिन बवाल, यूकेडी-कांग्रेस ने तोड़े बैरियर; वाटर कैनन से प्रदर्शनकारियों को रोका
- Dehradun : निजी स्कूल में छात्रा से बैड टच के आरोप पर हंगामा, NSUI का प्रदर्शन; शिक्षक के खिलाफ FIR दर्ज करने की प्रक्रिया
प्रयाग भारत , देहरादून: उत्तराखंड 9 नवंबर को अपना 26वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। अलग राज्य बनने के पीछे एक बड़ी उम्मीद यह थी कि पर्वतीय क्षेत्रों तक विकास पहुंचेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे। लेकिन राज्य गठन के करीब 26 साल बाद भी आर्थिक विकास का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा जिलों तक ही सीमित नजर आता है।
अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय के जिला घरेलू उत्पाद के वर्ष 2021-22 के आंकड़े राज्य की आर्थिक असमानता की तस्वीर सामने रखते हैं। रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून की राज्य की कुल जिला अर्थव्यवस्था में करीब 71.3 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके उलट बाकी 10 जिलों का योगदान लगभग 28.7 फीसदी ही है।
औद्योगिक गतिविधियों में यह अंतर और अधिक दिखाई देता है। राज्य के कुल औद्योगिक सकल मूल्य संवर्धन में इन तीन जिलों की हिस्सेदारी करीब 86 फीसदी है। वहीं प्रति व्यक्ति आय के मामले में मैदानी जिला हरिद्वार सबसे आगे है, जबकि पर्वतीय जिला रुद्रप्रयाग सबसे पीछे है।
दो मैदानी जिलों की अर्थव्यवस्था नौ पहाड़ी जिलों से 2.6 गुना बड़ी
जिला घरेलू उत्पाद के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2021-22 में हरिद्वार की अर्थव्यवस्था 85,636.20 करोड़ रुपये और उधम सिंह नगर की 57,579.20 करोड़ रुपये रही। दोनों जिलों को मिलाकर यह आंकड़ा 1,43,215.40 करोड़ रुपये पहुंचता है।
इसके मुकाबले नौ पर्वतीय जिलों उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत का कुल जिला घरेलू उत्पाद 54,431.16 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। यानी हरिद्वार और उधम सिंह नगर की संयुक्त अर्थव्यवस्था इन नौ पर्वतीय जिलों की अर्थव्यवस्था से करीब 2.6 गुना बड़ी थी।
वर्ष 2021-22 में उत्तराखंड के सभी 13 जिलों का कुल जिला घरेलू उत्पाद लगभग 2,71,797 करोड़ रुपये रहा। इसमें हरिद्वार और उधम सिंह नगर की हिस्सेदारी 52.7 फीसदी थी। नौ पर्वतीय जिलों का योगदान करीब 20 फीसदी रहा, जबकि देहरादून और नैनीताल की हिस्सेदारी लगभग 27.3 फीसदी दर्ज की गई।
देहरादून का जिला घरेलू उत्पाद 50,686.80 करोड़ रुपये और नैनीताल का 23,463.60 करोड़ रुपये था। इन आंकड़ों को देखें तो हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून मिलकर राज्य की कुल जिला अर्थव्यवस्था का करीब 71.3 फीसदी हिस्सा रखते हैं।
औद्योगिक क्षेत्र में सबसे ज्यादा असमानता
मैदानी और पर्वतीय जिलों के बीच आर्थिक अंतर की सबसे बड़ी वजह औद्योगिक गतिविधियों का असमान विस्तार है। निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021-22 में हरिद्वार का औद्योगिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 57,968 करोड़ रुपये रहा। उधम सिंह नगर में यह 30,028 करोड़ और देहरादून में 19,467 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
इन तीनों जिलों का संयुक्त औद्योगिक सकल मूल्य संवर्धन 1,07,463 करोड़ रुपये रहा। राज्य के सभी जिलों के औद्योगिक क्षेत्र के कुल 1,25,170 करोड़ रुपये के सकल मूल्य संवर्धन में इनकी हिस्सेदारी करीब 85.9 फीसदी थी।
इसके मुकाबले नौ पर्वतीय जिलों का औद्योगिक सकल मूल्य संवर्धन लगभग 10,782 करोड़ रुपये रहा, जो राज्य के कुल औद्योगिक मूल्य संवर्धन का महज 8.6 फीसदी है। इन आंकड़ों में खनन गतिविधियां भी शामिल हैं।
हरिद्वार और उधम सिंह नगर में औद्योगिक इकाइयों, विनिर्माण, बड़े कारोबार और उनसे जुड़ी सेवाओं का विस्तार हुआ है। वहीं पर्वतीय जिलों में उद्योगों की राह में कई चुनौतियां हैं। परिवहन लागत, बाजारों तक सीमित पहुंच, जमीन की उपलब्धता, कच्चे माल और कुशल श्रमिकों की कमी जैसे कारण औद्योगिक विकास को प्रभावित करते हैं।
आर्थिक जानकार प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी के मुताबिक, ऐसा नहीं है कि राज्य में 26 साल के दौरान विकास नहीं हुआ। लेकिन जिस सुनियोजित तरीके से विकास की दिशा में काम किया जाना चाहिए था, उस स्तर पर प्रयास नहीं हो पाए। उनका कहना है कि उत्तराखंड के जिलों की भौगोलिक परिस्थितियों में काफी अंतर है, जिसका असर उनकी आर्थिक स्थिति पर भी दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि चिंता सिर्फ मैदानी जिलों के मुकाबले पहाड़ी जिलों की कमजोर अर्थव्यवस्था की नहीं है, बल्कि यह भी है कि पर्वतीय क्षेत्रों की आर्थिक रफ्तार को मौजूदा स्तर से कहीं अधिक तेज किया जा सकता था।
खेती और प्राकृतिक संसाधनों में पहाड़ी जिलों की मजबूत मौजूदगी
प्राथमिक क्षेत्र के आंकड़ों में पर्वतीय जिलों की स्थिति औद्योगिक क्षेत्र से अलग नजर आती है। इस क्षेत्र में कृषि, बागवानी, पशुपालन, वानिकी, मत्स्य पालन और खनन जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
वर्ष 2021-22 में नौ पर्वतीय जिलों का प्राथमिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 11,765 करोड़ रुपये रहा। वहीं हरिद्वार और उधम सिंह नगर का संयुक्त आंकड़ा 10,746 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। देहरादून और नैनीताल को मिलाकर यह आंकड़ा 6,577 करोड़ रुपये रहा।
इससे स्पष्ट है कि कृषि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी गतिविधियों में पर्वतीय जिलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि इन उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने और उनसे अधिक आर्थिक लाभ हासिल करने की चुनौती बनी हुई है।
पहाड़ों में पैदा होने वाले कृषि और बागवानी उत्पादों के लिए स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। ऐसे में उत्पादन होने के बावजूद उसका पूरा आर्थिक लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था को नहीं मिल पाता। विशेषज्ञों के अनुसार इन गतिविधियों को वैल्यू एडिशन से जोड़ना पहाड़ी क्षेत्रों की आय बढ़ाने का अहम रास्ता हो सकता है।
सेवा क्षेत्र में भी चार जिलों का दबदबा
राज्य के सेवा क्षेत्र में भी कुछ चुनिंदा जिलों की मजबूत पकड़ दिखाई देती है। वर्ष 2021-22 में देहरादून का सेवा क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 26,328 करोड़ रुपये रहा। उधम सिंह नगर में यह 19,136 करोड़, हरिद्वार में 17,802 करोड़ और नैनीताल में 12,848 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
इन चार जिलों का संयुक्त योगदान 76,114 करोड़ रुपये रहा, जो राज्य के सेवा क्षेत्र के कुल 1,05,233 करोड़ रुपये का करीब 72.3 फीसदी है।
सेवा क्षेत्र में व्यापार, परिवहन, होटल और रेस्तरां, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, सार्वजनिक प्रशासन और अन्य सेवाएं शामिल होती हैं। देहरादून में सरकारी कार्यालयों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रियल एस्टेट का बड़ा आधार है। वहीं हरिद्वार और उधम सिंह नगर में उद्योगों के विस्तार के साथ उनसे जुड़ी सेवाएं भी विकसित हुई हैं।
पर्वतीय जिलों में पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों के जरिए रोजगार और कारोबार की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन इनका लाभ सभी क्षेत्रों और स्थानीय कारोबारियों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है।
प्रति व्यक्ति आय में हरिद्वार सबसे आगे, रुद्रप्रयाग सबसे पीछे
जिला घरेलू उत्पाद के साथ प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर दिखाते हैं।
वर्ष 2021-22 में हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय 3,62,688 रुपये रही। उधम सिंह नगर में यह 2,69,070 रुपये और देहरादून में 2,35,707 रुपये दर्ज की गई।
वहीं पर्वतीय जिलों में चमोली 1,27,330 रुपये की प्रति व्यक्ति आय के साथ सबसे आगे रहा। पिथौरागढ़ में यह 1,18,678 रुपये, चंपावत में 1,16,136 रुपये, पौड़ी में 1,08,640 रुपये और उत्तरकाशी में 1,07,281 रुपये रही।
टिहरी में प्रति व्यक्ति आय 1,03,345 रुपये, अल्मोड़ा में 1,00,844 रुपये और बागेश्वर में 98,755 रुपये दर्ज की गई। रुद्रप्रयाग में यह सबसे कम 93,160 रुपये रही। इस तरह हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय रुद्रप्रयाग के मुकाबले करीब 3.9 गुना अधिक थी।
आर्थिक वृद्धि दर में कुछ पहाड़ी जिलों का प्रदर्शन बेहतर
हालांकि आर्थिक वृद्धि दर के मामले में सभी पर्वतीय जिले पीछे नहीं रहे। वर्ष 2021-22 में स्थिर कीमतों पर चमोली की आर्थिक वृद्धि दर 11.5 फीसदी रही। पिथौरागढ़ और चंपावत में यह 11.2 फीसदी दर्ज की गई।
इसी अवधि में हरिद्वार की वृद्धि दर 10.3 फीसदी, रुद्रप्रयाग और टिहरी की 9.58 फीसदी तथा देहरादून की 8.78 फीसदी रही। वहीं बागेश्वर में यह 7.92 फीसदी और उधम सिंह नगर में 7.65 फीसदी दर्ज की गई।
निदेशालय की रिपोर्ट के मुताबिक चमोली में सेवा क्षेत्र की वृद्धि, जबकि पिथौरागढ़ और चंपावत में व्यापार, मरम्मत, होटल और रेस्तरां क्षेत्र में बढ़ोतरी इन जिलों की बेहतर आर्थिक वृद्धि के प्रमुख कारणों में शामिल रहे।
राज्य आंदोलन की मूल भावना पर उठ रहे सवाल
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की शुरुआत पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं और वहां विकास की जरूरत को लेकर हुई थी। आंदोलनकारियों की उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और उद्योगों का विस्तार होगा। लेकिन मौजूदा आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य की आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा अब भी कुछ मैदानी और शहरी जिलों में केंद्रित है।
राज्य आंदोलनकारी प्रदीप कुकरेती का कहना है कि उत्तराखंड राज्य की मूल संकल्पना पर्वतीय जिलों के विकास से जुड़ी थी, लेकिन राज्य गठन के बाद आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा मैदानी क्षेत्रों में ही दिखाई देता रहा। उनके मुताबिक, प्रदेश की सरकारों ने पहाड़ी जिलों की स्थिति बदलने के लिए घोषणाएं तो कीं, लेकिन धरातल पर ठोस नीतियों का प्रभाव पर्याप्त रूप से नजर नहीं आया।
उन्होंने कहा कि राज्य गठन के 26 साल बाद भी पहाड़ों से पलायन और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे बने हुए हैं।
विकास के संतुलन की चुनौती अब भी बरकरार
सरकारी आंकड़े कई अहम सवाल खड़े करते हैं। पर्यटन, बागवानी, वन आधारित उत्पाद, जड़ी-बूटी, पशुपालन और जल संसाधनों जैसी संभावनाओं के बावजूद पर्वतीय जिलों में स्थानीय रोजगार और उद्योगों का अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया है।
पहाड़ों में उत्पादन होने के बाद भी प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और बड़े कारोबार का केंद्र अक्सर मैदानी जिले बन जाते हैं। इससे रोजगार के अवसर और आर्थिक लाभ भी उन्हीं क्षेत्रों में अधिक केंद्रित रहते हैं।
उत्तराखंड के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक विकास को सभी जिलों तक पहुंचाने की है, ताकि राज्य की स्थापना के पीछे पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और स्थानीय लोगों की बेहतर आजीविका का जो सपना था, उसे जमीन पर उतारा जा सके।