RSS और प्रियांक खरगे के बीच बढ़ा टकराव, सवालों और जवाबों से गरमाई सियासत
प्रयागभरत, कर्नाटक: गृह मंत्री प्रियांक खरगे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बीच चल रहा विवाद अब और तीखा होता नजर आ रहा है। हाल ही में प्रियांक खरगे ने सोशल मीडिया के माध्यम से भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधते हुए कई सवाल उठाए, जिसके बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
खरगे ने आरोप लगाया कि जब भी आरएसएस की कार्यप्रणाली या जवाबदेही पर सवाल उठाए जाते हैं, तो भाजपा उसकी रक्षा में सामने आ जाती है। उन्होंने कहा कि भाजपा और आरएसएस के रिश्तों को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है और हालिया प्रतिक्रियाएं भी इसी संबंध को दर्शाती हैं।
कर्नाटक के गृह मंत्री ने आरएसएस के इतिहास और उसकी भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि स्वतंत्रता आंदोलन में संगठन की भूमिका क्या रही और राष्ट्रीय ध्वज को लेकर वर्षों तक चली बहस पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। इसके अलावा उन्होंने यह भी जानना चाहा कि संगठन संविधान और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को किस तरह परिभाषित करता है।
दरअसल, यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब प्रियांक खरगे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े प्रश्न उठाए थे। उन्होंने कहा था कि देशभर में व्यापक नेटवर्क और बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों वाले संगठन को पारदर्शिता के उच्च मानकों का पालन करना चाहिए।
खरगे ने यह भी सवाल किया कि संगठन की गतिविधियां किस कानूनी ढांचे के तहत संचालित होती हैं और क्या सभी आवश्यक नियमों एवं प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। उनके अनुसार, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय किसी भी बड़े संगठन को जवाबदेह और पारदर्शी होना चाहिए।
वहीं, आरएसएस और भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस पूरे मामले को राजनीतिक बयानबाजी करार दिया, जबकि भाजपा नेताओं ने भी खरगे के आरोपों का विरोध किया। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी रहा।
विवाद उस समय और बढ़ गया जब भाजपा के एक सांसद की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए खरगे ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संगठन या संस्था से सवाल पूछना नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने विचारों और सवालों पर कायम रहेंगे।
फिलहाल यह मुद्दा कर्नाटक ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शुरू हुई यह बहस अब संगठन की भूमिका, पारदर्शिता और राजनीतिक प्रभाव को लेकर व्यापक चर्चा में बदलती नजर आ रही है।