उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं हटाए जा सकते अतिक्रमणकारी
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Spread the loveप्रयाग भारत, नैनीताल : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे भूमि से कथित अतिक्रमणकारियों को हटाने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति को केवल प्रशासनिक नोटिस के आधार पर बेदखल नहीं किया […]
प्रयाग भारत, नैनीताल : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे भूमि से कथित अतिक्रमणकारियों को हटाने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति को केवल प्रशासनिक नोटिस के आधार पर बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे कब्जा अवैध ही क्यों न हो, उसे हटाने के लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने यह फैसला मसूरी के झड़ीपानी क्षेत्र से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ताओं ने नॉर्दर्न रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर (वर्क्स) द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें कथित रूप से रेलवे भूमि पर कब्जा करने वालों को निर्धारित समय के भीतर जमीन खाली करने के निर्देश दिए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही नोटिस उनके घरों पर चस्पा कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी अनुमति और सक्षम न्यायालय की प्रक्रिया अपनाए उसकी अचल संपत्ति या स्थापित कब्जे से जबरन बेदखल करना संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अवैध कब्जे में भी है, तब भी जमीन का मालिक कानून अपने हाथ में लेकर उसे बलपूर्वक नहीं हटा सकता।
अदालत ने कहा कि किसी भी बेदखली की कार्रवाई तभी वैध मानी जाएगी, जब सक्षम न्यायालय दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार आदेश पारित करे। केवल प्रशासनिक नोटिस जारी कर 30 दिनों के भीतर जमीन खाली करने का निर्देश देना कानून की दृष्टि में पर्याप्त नहीं है।
मामले में हाईकोर्ट ने रेलवे द्वारा 5 अक्टूबर 2023 को जारी नोटिस को निरस्त कर दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे यदि आवश्यक समझे तो कानून के अनुरूप उचित प्रक्रिया अपनाकर अतिक्रमण के मामलों में आगे कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।